Conclave: पी. साईनाथ बोले- पिछले दो हजार साल से जारी है जल की जंग

  • मीडिया कवरेज भी जल संकट से निपटने में मददगार साबित नहीं हो पा रहा
  • पानी का मसला आम नहीं बल्कि ये राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक भी है

दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ जल संकट भी बढ़ता जा रहा है. जल संकट के चलते देश में कृषि भी प्रभावित हुई है. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2019 में वरिष्ठ पत्रकार और पीपुल्स अर्काइव ऑफ रूरल इंडिया के संस्थापक संपादक पी. साईनाथ ने जल संकट के विभिन्न पहलुओं का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा, मुझे पता नहीं यह कब होगा, लेकिन पानी को लेकर पिछले दो हजार साल से जंग चल रही है.

पी. साईनाथ ने कहा कि पानी पर राजनीति और पानी के लिए राजनेता होना दोनों में अंतर है. मीडिया कवरेज भी जल संकट से निपटने में मददगार साबित नहीं हो पा रहा है. अगर हम बारिश को लेकर पिछले दो या तीन सप्ताह के अखबारों की हेडलाइन्स देखें तो पता चलेगा कि जल संकट को किस सीमित नजरिये से देखा जा रहा है. एक बात तो साफ है कि बारिश के पानी से भूमिगत जल के स्तर में कोई सुधार नहीं हो रहा है.  

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उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश की बात बताते हैं. पिछले कुछ सालों का उदाहरण लें. पिछले 20 वर्षों में से 16 वर्ष आंध्र प्रदेश में सूखे की स्थिति रही है. सबसे महत्वपूर्ण जल बंटवारे का मसला है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2018 में कहा था कि मानसून करीब-करीब सामान्य रहा है. लेकिन पिछले 100 सालों में मेरी जानकारी में नहीं है कि मानसून को लेकर इस तरह की कोई कैटगरी रही हो. मतलब आप कह रहे हैं कि आदमी आईसीयू में है, लेकिन मरा नहीं है. बारिश को सामान्य के करीब इसलिए बता रहे हैं क्योंकि सामान्य से कम बारिश हुई.

पी. साईनाथ ने कहा कि आईएमडी के क्षेत्रवार आंकड़े बताते हैं कि बारिश की दर में भारी कमी आई है. पानी का मसला आम नहीं बल्कि यह राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मसला भी है. पानी को लेकर अंतरराज्यीय विवाद भी चर्चित रहे हैं. पिछले 100 सालों से दक्षिण के राज्यों में जल विवाद बड़ा मसला बना हुआ है. कावेरी के जल बंटवारे को लेकर दो राज्यों का विवाद कितने समय से चल रहा है? कर्नाटक और तमिलनाडु का विवाद आजतक नहीं सुलझा.

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उन्होंने बताया कि अस्सी के दशक में लोगों को पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन तो याद होगा लेकिन पंजाब, हरियाणी और राजस्थान के बीच रवि-ब्यास नदी के जल बंटवारे को लेकर कितने दौर की बैठक चली यह किसी के जेहन में नहीं होगा. उस दौरान इस मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत लोंगोवाला के बीच 28 राउंड की बातचीत हुई थी. यह चर्चा गुरुवाणी या अन्य मुद्दे पर नहीं बल्कि पानी के मसले को सुलझाने को लेकर हुई थी.

पी. साईनाथ ने कहा कि लगातार लिखा जा रहा है कि पानी के लिए अगला विश्व युद्ध होगा. मुझे नहीं पता यह कब होगा, लेकिन यह सच है कि पिछले 2000 सालों से पानी को लेकर एक जंग चल रही है. हम रोज-ब-रोज पानी के लिए लड़-झगड़ रहे हैं. तेलंगाना बनाम आंध्र प्रदेश, करनूल बनाम महबूब नगर में पानी को लेकर विवाद चल रहा है.

पानी के लिए भाई, भाई की हत्या कर रहा है

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उन्होंने कहा कि यह झगड़े परिवारों तक पहुंच गए हैं. कुछ साल पहले करनूल में एक किसान की मौत हो गई और वह अपने पांच बेटों के लिए 20 एकड़ जमीन छोड़ गया. सामान्य सी बात है 20 एकड़ जमीन है तो हरेक बेटे को चार एकड़ जमीन मिलेगी. लेकिन छोटे भाई ने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी जबकि जमीन के बंटवारा तो सबसे आसान था. लेकिन उनके बीच झगड़ा बोरवेल को लेकर था कि किसके हिस्से में बोरवेल आएगा.

यानी पानी के लिए भाई ने भाई की हत्या कर दी. यह झगड़ा राज्य के स्तर से उतर कर परिवार तक पहुंच गया. भारत-पाकिस्तान के बीच फरक्का बैराज को लेकर विवाद चल ही रहा है. नेपाल के साथ कोसी बैराज का मसला है. बांग्लादेश के साथ भी हमारा पानी को लेकर विवाद है. ब्रह्मपुत्र नदी के साथ चीन का विवाद जुड़ा हुआ है. हमें इस मसले को देखने के लिए अपना नजरिया बदलना होगा. भारत हजारों सालों से जाति के जाल में फंसा हुआ है. पानी के संसाधनों पर जाति के हिसाब से कब्जा बना हुआ है.

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