देवउठनी एकादशी कल, जानें इस पर्व की मान्यता और शुभ मुहूर्त

डिजिटल डेस्क। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी कि दीपावली के 10 दिन बाद भगवान विष्णु सहित सभी देव जागते हैं और सृष्टि का कार्य-भार देखते हैं। इसे देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है जो कि इस वर्ष 8 नवंबर शुक्रवार को पड़ रही है। आइए जानते हैं देवउठनी एकादशी से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें…

एकादशी को ये पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व शास्त्रों में उल्लेखित है। एकादशी व्रत और कथा श्रवण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। क्षीरसागर में शयन कर रहे श्री हरि विष्णु को जगाकर उनसे मांगलिक कार्यों के आरंभ करने की प्रार्थना की जाती है। 

मान्यता
माना जाता है कि देवउठनी एकादशी से पूरे 6 माह के लिए देव जागते हैं। ऐसे में सभी मंगल कार्य इस एकादशी से शुरू होते है। इस एकादशी में ही तुलसी विवाह भी किया जाता है। श्रद्धालु आज के दिन श्री हरि को जगाते हैं और अविवाहितों के विवाह कराओ आदि विनती करते हैं। तुलसी का भगवान श्री हरि विष्णु के शालीग्राम स्वरूप के साथ विवाह कर श्रद्धालु उन्हें बैकुंठ को विदा करते हैं। हरि प्रबोधिनी एकादशी को व्यावहारिक भाषा में देवउठनी एकादशी कहा जाता है।

यह भी पढ़ें   आज का पंचांग, 28 जून, शुक्रवार के मुहूर्त, हिन्दू कैलेंडर के अनुसार दिन के शुभ-अशुभ समय और राहुकाल

शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारम्भः 07 नवम्बर सुबह 09:55 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 08 नवम्बर दोपहर 12:24 बजे तक
व्रत तोड़ने का समय: 9 नवंबर सुबह 06:39 बजे से 08:50 बजे तक
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय दोपहर 02:39 बजे

गन्नों के मंडप
देवउठनी ग्यारस पर मंदिरों व घरों में भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा-अर्चना की जाती है। मंडप में शालिग्राम की प्रतिमा एवं तुलसी का पौधा रखकर उनका विवाह कराया जाता है। मंदिरों के व घरों में गन्नों के मंडप बनाकर श्रद्धालु भगवान लक्ष्मीनारायण का पूजन कर उन्हें बेर,चने की भाजी, आंवला सहित अन्य मौसमी फल व सब्जियों के साथ पकवान का भोग अर्पित किया जाता है।

मण्डप की परिक्रमा
इसके बाद मण्डप की परिक्रमा करते हुए भगवान से कुंवारों के विवाह कराने और विवाहितों के गौना कराने की प्रार्थना की जाती है। तुलसी को माता कहा जाता है क्योंकि तुलसी पत्र चरणामृत के साथ ग्रहण करने से अनेक रोग दूर होते हैं। शालीग्राम के साथ तुलसी का आध्यात्मिक विवाह देव उठनी एकादशी को होता है लेकिन उनके पत्र मंजरी पूरे वर्ष भर देवपूजन में प्रयोग होते हैं। तुलसी दल अकाल मृत्यु से भी बचाता है।

यह भी पढ़ें   29 सितंबर, रविवार के मुहूर्त, हिन्दू कैलेंडर के अनुसार दिन के शुभ-अशुभ समय और राहुकाल

महत्व 
वैष्णवजन के लिए तुलसी जी का विशेष महत्व होता है। वह तुलसी की माला धारण करते हैं और जपते हैं। तुलसी पत्र के बिना भोजन नहीं करतें हैं। कहा जाता है कि तुलसी पत्र डालकर जल या दूध चरणामृत बन जाता है तथा भोजन भी प्रसाद बन जाता है। इसीलिए तुलसी विवाह का महोत्सव वैष्णवों को परम संतोष देता है। साथ ही प्रत्येक घर में छह महीने तक हुई तुलसी पूजा का इस दिन तुलसी विवाह के रूप में होता है। तुलसी के गमले को गोमय एवं गेरू से लीप कर उसके पास पूजन की चौकी पूरित की जाती है। 

पंचांग पूजन
गणेश पूजा के साथ पंचांग पूजन के बाद तुलसी विवाह की सारी विधि होती है। श्रद्धालु मंगल वाद्ययंत्रों के साथ उन्हें पालकी में बिठाकर मंदिर परिसर एवं घर-आंगन में घूमाकर पूर्व स्थान से दूसरे स्थान पर रख देते हैं। बधाईके गीत गाए जाते हैं और सगुन में मिष्ठान्न, प्रसाद, फल एवं दक्षिणा दी जाती है। प्रबोधिनी एकादशी के दिन शालिग्राम, तुलसी व शंख का पूजन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। गोधूलि बेला में तुलसी विवाह करने का पुण्य लिया जाता है। दीप मालिकाओं से घरों को प्रकाशित किया जाता है और बच्चे आतिशबाजी चलाकर खुशियां मनाते हैं। 

यह भी पढ़ें   17 जुलाई से शुरू होगा सावन और सूर्य राशि बदलेगा, 12 राशियों पर होगा असर

.Download Dainik Bhaskar Hindi App for Latest Hindi News.

.

...
Dev Uthani Ekadashi 2019: know the significance of this festival and auspicious time
.
.

.